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सोमवार, अगस्त 01, 2011

माँ..माँ
क्या तू सुन रही है?
तुझमे  मैं और मुझमे तू है.
तेरा दर्पण,तेरा चेहरा,तेरी ही तो अक्श हूँ मैं.
माँ,ओ मेरी माँ......
तेरी आँखे,तेरी सांसे,तेरा ही तो रक्त हूँ मैं.
फिर क्यूँ  मेरे अपने मुझसे रूठे...
मुझको तेरी गोद से रोके,   
किलकारी क्यूँ मेरी घोंटे.
जानती हूँ  मजबूर है.
तभी तू मुझसे दूर है.
कबतक मौन रहेगी माँ...
कितना दर्द सहेगी माँ?

3 टिप्‍पणियां:

  1. सटीक तस्वीर के साथ मार्मिक प्रस्तुति

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  2. बहुत ही सुंदर लिखा है..शुभकामनाएँ।

    welcome on my sites....

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    Er. satyam shivam

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  3. जानती हूँ मजबूर है.
    तभी तू मुझसे दूर है.
    कबतक मौन रहेगी माँ...
    कितना दर्द सहेगी माँ?
    Nice Lines !

    उत्तर देंहटाएं

आपकी सराहना ही मेरा प्रोत्साहन है.
आपका हार्दिक धन्यवाद्.