मेरी ब्लॉग सूची
बुधवार, अगस्त 03, 2011
सोमवार, अगस्त 01, 2011
क्या तू सुन रही है?
तुझमे मैं और मुझमे तू है.
तेरा दर्पण,तेरा चेहरा,तेरी ही तो अक्श हूँ मैं.
माँ,ओ मेरी माँ......
तेरी आँखे,तेरी सांसे,तेरा ही तो रक्त हूँ मैं.
फिर क्यूँ मेरे अपने मुझसे रूठे...
मुझको तेरी गोद से रोके,
किलकारी क्यूँ मेरी घोंटे.
जानती हूँ मजबूर है.
जानती हूँ मजबूर है.
तभी तू मुझसे दूर है.
कबतक मौन रहेगी माँ...
कितना दर्द सहेगी माँ?
शुक्रवार, जुलाई 29, 2011
उसका दर्द
उसे फिर किसी ने रुलाया है.
सपनो ने नज़रें फेरीं है,
किसी हाथ ने अंगुली छुड़ाई है.
दिल में नए अरमान लिए,
वह टूट टूट के जुड़ती है.
फिर कोई पत्थर हाथ लिए,
शीशे से उसके ख्वाबों को,
चूर चूर कर जाता है.
फिर भी वो हंसती रहती है,
ये कैसी उसकी शक्ति है.
प्रभु तू, भी इतना कठोर न बन,
कुछ खुशियाँ उसके लिए भी बुन.
क्या वो तेरा अंश नही,
जीना उसका अधिकार नही?
गुरुवार, जुलाई 21, 2011
बिटिया न कीजो
आज वो नही आई,
फिर घर पर कुछ हुआ होगा.
उसके रिसते घाव को कुरेदा होगा .
लड़की होने के ताने दिए होंगे,
रंग रूप कद काठी,से हिन् बताया होगा.
फिर कोई रिश्तों के सौदागर पधारें होंगे.
उसे चलाकर,उठाकर,बिठाकर, गवाकर,
सिलाई बुनाई,पकवान बनवाए होंगे.
फिर नैन नक्श में कमियाँ गिनवाई होंगी.
अपने सुपुत्र की उपलब्धियों की लिस्ट थमाई होगी,
पिता को बेटी के बाप होने का दर्द समझाया होगा.
सोचकर खबर कर देंगे,ऐसा कह निकल गए होंगे
माँ ने बढ़ती उम्र की दुहाई दी होगी,
पिता ने दहेज़ की असमर्थता जताई होगी.
मुँह पर दुप्पटा रख उसने अपनी आवाज़ दबाई होगी,
उसे बेटी होने पर नफ़रत आई होगी.
"अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो"
मन ही मन ईश्वर से मनाया होगा.
रविवार, मई 08, 2011
आज कल जो देखने और पढने को मिल रहा है उससे यही लगता है की ओसामा बिन लादेन के वारिस का पता लगाना ,
देश की सुरक्षा से भी ज्यादा जरुरी हो गया है.इतनी चिंता तो सत्य साईं और अन्य अच्छे लोगों के वारिस के बारे में भी नही था ,
एक तरफ तो हम आतंकवाद को जड़ से ख़त्म करने की बात करते हैं,दूसरी तरफ आतंकवाद का वारिस जोर-शोर से ढूंढ़
रहे हैं .क्या फर्क पड़ता है की कौन अगला आतंकवादी होगा!.जो भी होगा वो इंसानियत का दुश्मन ही होगा ना?
इससे हटकर अगर हम ये सोचें की उन बचेखुचे दुश्मनों जो आतंक का रूप ले चुके है,जो अपनी इस गहरी चोट से तिलमिलाएं हैं
उनके फ़न फ़ैलाने से पहले कुचल दें! जरुरी ये होना चाहिए की हम तैयार रहें उन कठिन परिस्थितियों के लिए,जो भविष्य के गर्भ में हैं.
क्या हम आतंकवाद के उत्तराधिकारी ढूंढ़ कर उन्हें बढ़ावा नही दे रहे? क्या ओसामा इतना इस लायक था की उसे याद किया जाये?
देश की सुरक्षा से भी ज्यादा जरुरी हो गया है.इतनी चिंता तो सत्य साईं और अन्य अच्छे लोगों के वारिस के बारे में भी नही था ,
एक तरफ तो हम आतंकवाद को जड़ से ख़त्म करने की बात करते हैं,दूसरी तरफ आतंकवाद का वारिस जोर-शोर से ढूंढ़
रहे हैं .क्या फर्क पड़ता है की कौन अगला आतंकवादी होगा!.जो भी होगा वो इंसानियत का दुश्मन ही होगा ना?
इससे हटकर अगर हम ये सोचें की उन बचेखुचे दुश्मनों जो आतंक का रूप ले चुके है,जो अपनी इस गहरी चोट से तिलमिलाएं हैं
उनके फ़न फ़ैलाने से पहले कुचल दें! जरुरी ये होना चाहिए की हम तैयार रहें उन कठिन परिस्थितियों के लिए,जो भविष्य के गर्भ में हैं.
क्या हम आतंकवाद के उत्तराधिकारी ढूंढ़ कर उन्हें बढ़ावा नही दे रहे? क्या ओसामा इतना इस लायक था की उसे याद किया जाये?
उस कुख्यात व कुमार्गी का अंत ऐसा ही होना तय था, ईश्वर का न्याय हमेशा सर्वोपरी होता है.
गुरुवार, मई 05, 2011
आइना
औरों को नसीहत देता है, मनुज तू!
कभी खुद भी अमल कर देख.
नीद में सपने सबने देखा,
कभी जागती आँखों के सपने देख.
दिन उजियारा जग में फैला,
रात को दिन में बदल कर देख.
खून के रिश्ते अपने होते हैं,
कभी दिल के रिश्ते निभा के देख.
लहू से होली खूब है खेली,
काया से अमृत छलका के देख.
कभी खुद भी अमल कर देख.
झूठ ही सोया झूठ ही जागा,
कभी सच की रह पे चल कर देख. नीद में सपने सबने देखा,
कभी जागती आँखों के सपने देख.
दिन उजियारा जग में फैला,
रात को दिन में बदल कर देख.
खून के रिश्ते अपने होते हैं,
कभी दिल के रिश्ते निभा के देख.
लहू से होली खूब है खेली,
काया से अमृत छलका के देख.
शुक्रवार, अप्रैल 29, 2011
सूनापन
आज दिल फिर उदास क्यूँ है?
गीला है आँखों का समन्दर ,
फिर सूखेपन का अहसास क्यूँ है.? माना पाना ही जन्नत नही,
फिर तेरे जाने से खालीपन का आभास क्यूँ है?
दिल के बिखरे टुकड़े चुन चुन जोड़ दिए ,
फिर भी इसमे सुराख़ क्यूँ है?
सांसों की डोर प्रेम के धागे से बंधी थी हमने,
आज इसमे हल्की सी दरार क्यूँ है?
गीला है आँखों का समन्दर ,
फिर सूखेपन का अहसास क्यूँ है.? माना पाना ही जन्नत नही,
फिर तेरे जाने से खालीपन का आभास क्यूँ है?
दिल के बिखरे टुकड़े चुन चुन जोड़ दिए ,
फिर भी इसमे सुराख़ क्यूँ है?
सांसों की डोर प्रेम के धागे से बंधी थी हमने,
आज इसमे हल्की सी दरार क्यूँ है?
सोमवार, जनवरी 10, 2011
प्राइवेट नौकरी
क्या तुम्हे वो रात याद है?
कौन सी रात?
तुम फिर भूल गये!
ओह! ये तुम्हारे भूलने की बीमारी
खैर छोड़ो..
कल की अहमियत समझते हो न तुम!
कल क्या है?
उफ़!
बाबूजी की पुण्यतिथि है
ओह! हाँ याद आया.
काम का इतना दबाव है की...
बाबूजी को गुजरे दो साल हो गये क्या?
याद करने का समय नहीं मिला!
हुं!!!
माँ का फोन आया था.
क्या कहा?
गाँव बुला रही है !
पर छुट्टी नहीं मिलेगी.
बॉस से बात करता हूँ!
प्राइवेट नौकरी है
बार बार छुट्टी नही मिलेगी.
समझती हो ना...
हुम्म!!!!!!
कौन सी रात?
तुम फिर भूल गये!
ओह! ये तुम्हारे भूलने की बीमारी
खैर छोड़ो..
कल की अहमियत समझते हो न तुम!
कल क्या है?
उफ़!
बाबूजी की पुण्यतिथि है
ओह! हाँ याद आया.
काम का इतना दबाव है की...
बाबूजी को गुजरे दो साल हो गये क्या?
याद करने का समय नहीं मिला!
हुं!!!
माँ का फोन आया था.
क्या कहा?
गाँव बुला रही है !
पर छुट्टी नहीं मिलेगी.
बॉस से बात करता हूँ!
प्राइवेट नौकरी है
बार बार छुट्टी नही मिलेगी.
समझती हो ना...
हुम्म!!!!!!
रविवार, जनवरी 02, 2011
सुना है!
सुना है!दुआएं असर करती है,
अक्सर बद्दुआओं को असर करते देखा है.
सुना है!पिता के कर्मो की सजा पुत्र को भुगतनी पड़ती है.
अक्सर पुत्र के कृत की सजा पिता को सहते देखा है.
सुना है!विरानो में बहारें नहीं आती,
हमने अक्सर शमशानों में फूल खिलते देखा है.
सुना है!मुहब्बत जिंदगी में एक बार होती है,
अक्सर मुहब्बत का खेल बनते देखा है.
सुना है!दोस्त दिल के सबसे करीब होता है,
हमने अक्सर दोस्ती को दफ़न होते देखा है.
सुना है!प्रभु की राह में चलने वाले,
भौतिकवादी नही होते,
हमने अक्सर संतों को अशर्फियों पे उंघते देखा है.
सुना है! पीढियां रिवाजें चलाती हैं,
अक्सर रिवाजों तले पीढ़ियों को मरते देखा है.
सुना है!अपना खून अपना ही होता है,
हमने अक्सर अपनों को अपनों का खून करते देखा है.
सुना है!मुर्दे की जुबां नही होती,
हमने अक्सर जुबां वालों का गूंगापन देखा है.
सुना है!प्यार में शर्त नही होती,
हमने अक्सर शर्ते मुहब्बत देखा है.
अक्सर बद्दुआओं को असर करते देखा है.
सुना है!पिता के कर्मो की सजा पुत्र को भुगतनी पड़ती है.
अक्सर पुत्र के कृत की सजा पिता को सहते देखा है.
सुना है!विरानो में बहारें नहीं आती,
हमने अक्सर शमशानों में फूल खिलते देखा है.
सुना है!मुहब्बत जिंदगी में एक बार होती है,
अक्सर मुहब्बत का खेल बनते देखा है.
सुना है!दोस्त दिल के सबसे करीब होता है,
हमने अक्सर दोस्ती को दफ़न होते देखा है.
सुना है!प्रभु की राह में चलने वाले,
भौतिकवादी नही होते,
हमने अक्सर संतों को अशर्फियों पे उंघते देखा है.
सुना है! पीढियां रिवाजें चलाती हैं,
अक्सर रिवाजों तले पीढ़ियों को मरते देखा है.
सुना है!अपना खून अपना ही होता है,
हमने अक्सर अपनों को अपनों का खून करते देखा है.
सुना है!मुर्दे की जुबां नही होती,
हमने अक्सर जुबां वालों का गूंगापन देखा है.
सुना है!प्यार में शर्त नही होती,
हमने अक्सर शर्ते मुहब्बत देखा है.
सोमवार, अगस्त 23, 2010
समय
समय नहीं समय के साथ,
हाथ नहीं किसी के हाथ.
आँखों में मैल,ह्रदय में बैर,
अधरों पर झूठी मुस्कान.
भागे मन शहरों से शहरों,
व्याकुल मन स्नेह को तरसे.
नैन एक विश्वास को बरसे
भरोसा अपना अस्तित्व खो रहा,
स्वार्थ हर दमन का साथी
ये तेरा है ,ये मेरा है.
सब मेरा है क्या तेरा है.
सपनो को सच करने को,
अस्मत को फूंक मुस्कान दिखा.
हाथ नहीं किसी के हाथ.
आँखों में मैल,ह्रदय में बैर,
अधरों पर झूठी मुस्कान.
भागे मन शहरों से शहरों,
व्याकुल मन स्नेह को तरसे.
नैन एक विश्वास को बरसे
भरोसा अपना अस्तित्व खो रहा,
स्वार्थ हर दमन का साथी
ये तेरा है ,ये मेरा है.
सब मेरा है क्या तेरा है.
सपनो को सच करने को,
अस्मत को फूंक मुस्कान दिखा.
शनिवार, अगस्त 21, 2010
लिप्सा
उस सृष्टिकर्ता के समक्ष
रे मुर्ख मनुष्य
तू ले अपना आविष्कार खड़ा
करवाने सत्कार खड़ा
गगन चुम्बी इमारतें,
परिंदों संग उड़ने की लालसा.
सब कुछ पा लेने की उन्माद में,
बहता आगे चला गया
आत्मश्लाघी बन तुने
अहंकारी अट्ठास किया.
अपनी लिप्सा में अंध ,
देखा सका ना,
तुने खोदी है खाई
प्रभु की इस सुन्दर रचना की,
क्या बीभत्स रूप किया.
मूर्ख मनु तू नही जानता
उसकी अगली चाल है क्या?
तुने किया है छल प्रकृति से,
तु ही मूल्य चुकाएगा
अपनी वांछा पे संयम रख
उस अदृश्य शक्ति से
नहीं कभी बच पायेगा .
रे मुर्ख मनुष्य
तू ले अपना आविष्कार खड़ा
करवाने सत्कार खड़ा
गगन चुम्बी इमारतें,
परिंदों संग उड़ने की लालसा.
सब कुछ पा लेने की उन्माद में,
बहता आगे चला गया
आत्मश्लाघी बन तुने
अहंकारी अट्ठास किया.
अपनी लिप्सा में अंध ,
देखा सका ना,
तुने खोदी है खाई
प्रभु की इस सुन्दर रचना की,
क्या बीभत्स रूप किया.
मूर्ख मनु तू नही जानता
उसकी अगली चाल है क्या?
तुने किया है छल प्रकृति से,
तु ही मूल्य चुकाएगा
अपनी वांछा पे संयम रख
उस अदृश्य शक्ति से
नहीं कभी बच पायेगा .
गुरुवार, अगस्त 19, 2010
आह्वान
आओ अर्जुन और आजाद,
आओ भीम और सुभाष,
हिन्दोस्तान की सुनो आवाज़.
आज मान रखनी है तुमको,
हिंद की उतर रही है ताज.
अपने ही दुशास्सन बनके,
उतार रहे वसुधा की लाज.
अज्ञात वास अब बहुत हो चुका ,
देश हमारा बहुत रो चुका.
शोणित अपना बहुत खो चुका!
क्षमा,दया,तप,त्याग मनोबल
अलंकार है इस अवनी के
खल ने किये घात पर घात
करनी उनकी अक्षम्य हो गयी.
आई अब कृपाण,गदा की बारी,
देखेगी फिर दुनिया सारी!
आओ गाँधी आओ साईं
जिनके हाथों देश सौंप गए
निर्लज्जों ने दुर्दशा बनायीं
जाके तुम परलोक बैठ गये,
मर्कट,गर्दभ,उलूक छोड़ गये,
आ भी जाओ देश पुकारे
तुम सा कोई संत कहाँ अब
लालच का कोई अंत कहाँ अब
ऐसा कोई संत नही है
जिसकी न हो काली कमाई
आओ राम आओ हनुमान
रावण आज घर-घर में बैठे
कैसे सीता लाज बचाए
आओ हनु अब तुमरी आस है
सिय की मान अब तुमरे हाथ है
महावीर बस तुम ही कर सकते
वैदेही की टोह ले आओ
हम कब से है टेर लगाते,
सुनो राम सिय हिय रोये.
आओ भीम और सुभाष,
हिन्दोस्तान की सुनो आवाज़.
आज मान रखनी है तुमको,
हिंद की उतर रही है ताज.
अपने ही दुशास्सन बनके,
उतार रहे वसुधा की लाज.
अज्ञात वास अब बहुत हो चुका ,
देश हमारा बहुत रो चुका.
शोणित अपना बहुत खो चुका!
क्षमा,दया,तप,त्याग मनोबल
अलंकार है इस अवनी के
खल ने किये घात पर घात
करनी उनकी अक्षम्य हो गयी.
आई अब कृपाण,गदा की बारी,
देखेगी फिर दुनिया सारी!
आओ गाँधी आओ साईं
जिनके हाथों देश सौंप गए
निर्लज्जों ने दुर्दशा बनायीं
जाके तुम परलोक बैठ गये,
मर्कट,गर्दभ,उलूक छोड़ गये,
आ भी जाओ देश पुकारे
तुम सा कोई संत कहाँ अब
लालच का कोई अंत कहाँ अब
ऐसा कोई संत नही है
जिसकी न हो काली कमाई
आओ राम आओ हनुमान
रावण आज घर-घर में बैठे
कैसे सीता लाज बचाए
आओ हनु अब तुमरी आस है
सिय की मान अब तुमरे हाथ है
महावीर बस तुम ही कर सकते
वैदेही की टोह ले आओ
हम कब से है टेर लगाते,
सुनो राम सिय हिय रोये.
बुधवार, अगस्त 18, 2010
प्रेम
प्रेम जीवन का आधार,
इसकी लीला अनंत-अपार.
प्रेम हो कृष्ण -राधे सा,
शिव गौरी का साहचर्य था जैसे
प्रीत चकवा चकोर है करता
आस्था देख राम की सबरी पर,
प्रेम के वश में कौन नहीं है,
प्रेम के हैं रूप अनेक,
सब्र अहिल्या का कैसे भुला तू.
विश्वास द्रौपदी के कृष्ण थे,
प्रेम के वश में मुरली मनोहर,
बने पार्थ के सारथी सहचर,
कण कण में विश्वास माँगता,
प्रेम डगर है त्याग चाहता
इस भाव का ओर न छोर,
प्रेम चक्षु से देखो गर तुम,
कण कण में फैली चहुँ ओर
दोनों हाथों से समेट लो
ह्रदय- ह्रदय निर्मल बसंत हो.
.
इसकी लीला अनंत-अपार.
प्रेम हो कृष्ण -राधे सा,
शिव गौरी का साहचर्य था जैसे
प्रीत चकवा चकोर है करता
आस्था देख राम की सबरी पर,
प्रेम के वश में कौन नहीं है,
प्रेम के हैं रूप अनेक,
सब्र अहिल्या का कैसे भुला तू.
विश्वास द्रौपदी के कृष्ण थे,
प्रेम के वश में मुरली मनोहर,
बने पार्थ के सारथी सहचर,
कण कण में विश्वास माँगता,
प्रेम डगर है त्याग चाहता
इस भाव का ओर न छोर,
प्रेम चक्षु से देखो गर तुम,
कण कण में फैली चहुँ ओर
दोनों हाथों से समेट लो
ह्रदय- ह्रदय निर्मल बसंत हो.
.
सोमवार, अगस्त 16, 2010
नारी
नारी है नर का आधा,
पर वो उसकी हर राह में बाधा।
प्यार से तकरार से,
डरता है वो अपनी हार से।
फिर भी कहता ,
साथ हूँ तेरे मन कर्म और विचार से।
खुद पर उसे विश्वास नहीं है,
अहम् की चादर रखी ओढ़ है ,
पर की नैन से दुनिया देखे,
नारी के हर रूप से,
उसके अहंकार को घात लगी है.
नर है वो सर्वज्ञ,सर्वेश्वर,
नारी बस उसके अधीन हो.
पर वो उसकी हर राह में बाधा।
प्यार से तकरार से,
डरता है वो अपनी हार से।
फिर भी कहता ,
साथ हूँ तेरे मन कर्म और विचार से।
खुद पर उसे विश्वास नहीं है,
अहम् की चादर रखी ओढ़ है ,
पर की नैन से दुनिया देखे,
नारी के हर रूप से,
उसके अहंकार को घात लगी है.
नर है वो सर्वज्ञ,सर्वेश्वर,
नारी बस उसके अधीन हो.
मंगलवार, अगस्त 03, 2010
जननी हूँ
खामोशियों को मेरे कमजोरियां न समझो,खामोश हूँ मेरे अन्दर तूफान उठ रहे हैं.
तुफानो को समेटे अन्तः धधक रहे है,
अधरों के दो किनारे शैलाब को हैं रोके.
इतना न तुम कुरेदो टूट जायेंगे किनारे,
टुटा जो ये किनारा शैलाब ना रुकेगा.
तूफान उठ गया तो ,डोलेगी सारी धरती,
वीरान हो रहेगी बंजर ये सारी सृष्टि.
जननी हूँ जन्म देना कर्तव्य है हमारा,
तनया को जन्म देना अभिशाप क्यूँ हमारा.
माता बहन और पत्नी हर रूप का है स्वागत,
पुत्री हो गयी तो क्यूँ कर दिया अनादर.
सदस्यता लें
संदेश (Atom)






