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सोमवार, अक्तूबर 15, 2012

परछाई

धुंधलाया सा एक साया है ,जो मेरे सामने आया है ,
पूछा मैंने उस साये से ,कौन है तू क्या नाम तेरा।
"वो बस हल्का सा मुस्काया है"
मेरे आँखों में प्रश्न बड़े,अंनत आशंकाएँ आन खड़े,
"वो अब भी निर्मल कांत खड़ा"
बेचैनी मेरी बृहद हुयी,स्थिति और भी दुखद हुई।
देख दुर्दशा ऐसी मेरी,
उसने खुद को गंभीर किया,फूटा कंठ कठोर नाद,
अब क्यूँ घबराया रे मनुज,
क्या खुद की भी पहचान नही।
इतना अँधा कैसे हो गया ,अपना ही अस्तित्व खो गया।
धन अभिमान के अंधे दौड़ में,कौन है तू क्या नाम तेरा ,
ये स्वयं भूल गया।
मन की आँखे खोल रे मानस ,देख तेरा क्या हश्र हो गया।
मैं हूँ तेरा ही कोमल मन,सत्य अर्थ प्रकाश लिए तेरी ही परछाई हूँ
तुझको तुझसे मिलवाने लायी हूँ।
                                          सुनीता

1 टिप्पणी:

  1. मनुष्य को अपनी परछाँई को निहारकर खुद के दोष ढूँढना आवश्यक है - प्रेरक प्रस्तुति

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आपकी सराहना ही मेरा प्रोत्साहन है.
आपका हार्दिक धन्यवाद्.