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गुरुवार, अगस्त 04, 2011


मै अबोध ,क्या जानू सुन्दरता
तुमने कहा बहुत सुन्दर हो.
                    "मै संवरना सिख गयी"
                     मै अल्हड़ ,चंचल हिरनी,
तुम्हारे आगे पीछे डोलती ,भागती,
डगर का पता ना मंजिल का.
                     तुमने हाथ थाम्हा,
                    " मै चलना सीख़ गयी "
मैंने अधिकार जताया
तुमने समर्पण का भाव दर्शाया .
                       " मै समर्पित होना सीख़ गयी"
तुमने  कठिन जीवन में ,
प्रेम का सरल अर्थ समझाया
                           हमारे प्रेम को कृष्ण-राधे सा मधुर साहचर्य  बनाया.
 
 

3 टिप्‍पणियां:

  1. pyaari aur haseen rachna hai....


    http://teri-galatfahmi.blogspot.com/

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  2. बहुत ही प्यारी रचना है आपकी बधाई हो आपको दिल के तारों को झंझोर दिया आपके इन पंक्तियों ने..
    तुमने हाथ थाम्हा,
    " मै चलना सीख़ गयी "
    मैंने अधिकार जताया
    तुमने समर्पण का भाव दर्शाया .
    " मै समर्पित होना सीख़ गयी"

    आप भी मेरे ब्लाग में आकर मेरे सहयोगी मित्रों में से एक बने तो मुझे बहुत ख़ुशी होगी

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  3. kavitaon se mera lagav naya nahi...

    lekin sundarta ko shabdo me prastut karna aasan bhi nahi....

    kai bar to mahaj tukbandi poori padni padti hai..

    aise me yah rachna bhor ke jhonke se kuchh kam nahi....

    SUNDER HAI...

    pathik.

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आपकी सराहना ही मेरा प्रोत्साहन है.
आपका हार्दिक धन्यवाद्.